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د همايون حيدر يو ښايسته غزل

03.05.2013 08:24

غزل
نــن خـــو یې له هر خوا خوشبویي راځي
بیا لـکه نصــیـب چـــه یـې راوړي راځي



نـــــوم چـــــه د هـــر چـا تــه یــادوم کـله
خـــوله کې مې اشـــنا بس اسويلي راځي

څــه وکـــړم مجبور یم چــه یې څښمه نن
نــن خـــو مـې سـاقي مـخې ته ځـي راځي

خیر که د بیلتون په غـیږ کې ور یې کړې
مـــینه کـې خفـــګان او خـوشــــالي راځي



اوس چــه «حیدر» دې خالــت کې وویني
اوښکې په ګـــریـوان د هــر ســړي راځي

 

همايون  حيدر 
خوست

 


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